क्या हममें आहत होने की चाहत बढ़ रही है?

पिछले कुछ सालो में आहत होने की चाहत में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सोशल मीडिया ने सारी मुसीबतो से "कोप" करते हुए आहत होने के स्कोप का वृहद विस्तार किया है।

भारत में आहत होने के लिए कोई न्यूनतम अर्हता निर्धारित  नहीं की गई है। अर्हता के साथ साथ आहत होने का कोई कोटा भी फिक्स नहीं किया गया है, मतलब आहत होने की वैलिडिटी अनलिमिटेड और आहत-टाइम अनलिमिटेड भी हो सकता है, और इसकी “प्राइम मेंबरशिप” लेने के लिए केवल “हम विहीन” अहम की ज़रूरत होती है। सविंधान में “आहत होने के अधिकार” का कोई जिक्र नहीं किया गया है, क्योंकि सविंधान निर्माता दूरदर्शी थे ,वे इस अधिकार को जिक्र करके किसी को आहत नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस अधिकार को सविंधान में ठीक उसी तरह से साइलेंट रखा, जिस तरह से विनाशक Tsunami (सुनामी) में T साइलेंट रहता है।

Burnol - Always keep it handy
सोशल मीडिया पर आजकल बरनोल एक दूसरे को धड़ल्ले से बांटी जा रही है।

हमारे यहाँ, कोई भी, कभी भी, किसी भी दिशा से, कितनी भी डिग्री से आहत होने के लिए स्वतंत्र है, और इसके लिए उसे केवल अपनी कोमल भावनाओं को थोड़ी तकलीफ देते हुए उन्हें तुष्टिकरण की बगिया से असंतुष्टी के “कोप-भवन” में शिफ्ट करना होता है। ये शिफ्टिकरण इतना नियमित होता है कि भावनाओ की लोडिंग-अनलोडिंग अपने “ईगो” को “लेटस- गो” कह देने मात्र से हो जाती है।

पिछले कुछ सालो में आहत होने की चाहत में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सोशल मीडिया ने सारी मुसीबतो से “कोप” (Cope) करते हुए आहत होने के स्कोप का वृहद विस्तार किया है। सोशल मिडिया आने के बाद से आहत होने की प्रवृति हताहत होने से बची है, क्योंकि सोशल मिडिया ने उन सभी “आहतातुर प्राणियो” को ऐसा प्लेटफार्म दिया, जहाँ वो अपनी आहत-एक्सप्रेस को कभी भी गंतव्य स्थान के लिए रवाना कर सकते हैं। सोशल मिडिया आने के पहले ना जाने कितने “आहातातुर-प्राणी” गुमनामी का जीवन बसर कर रहे थे, और उनकी “आहत-वाणी” सुनने के लिए पर्याप्त संख्या में कान उपलब्ध नहीं होते थे। लेकिन सोशल मिडिया आने के बाद से ये प्राणी अपनी वाणी को आराम-विराम दिए बिना बाकि लोगो को इससे उपराम कर रहे हैं। मतलब पूर्णकालिक आहत होने के लिए पहले ऑनलाइन होना ज़रूरी है। आहत होना इनकी नित्य क्रिया में शामिल हो चुका है, अगर गलती से एक दिन ये आहत होने से रह जाएं, तो भयंकर वाली कब्ज़ियित का शिकार हो जाते हैं, जिससे कायम चूर्ण से भी आराम मिलना मुश्किल होता है।

राजनीती, खेल, बॉलीवुड, धर्म या अन्य किसी भी क्षेत्र से जुडी कोई भी घटना हो, या इनसे जुड़े किसी भी सेलेब्रिटी या किसी व्यक्ति का कोई भी बयान हो, वो रोज़ सोशल मीडिया की भट्टी में ईंधन रूपी कच्चे माल के रूप में झोंक दिया जाता है, जो “ट्रेंड” की शक्ल में बाहर निकल कर लोगो की कोमल भावनाऐं आहत करने का अपना क़र्ज़ और फ़र्ज़ अदा करता है।

जैसे इंसान रोज़ एक सब्ज़ी नहीं खा सकता है, उसी तरह से आहत धर्म-प्रेमी रोज़ किसी नए मुद्दे से आहत होना पसंद करते हैं, जिससे उनकी आहत होने की प्रतिभा बहुआयामी हो सके।

रोज़ रोज़ किसी ना किसी मुद्दे पर आहत होने वाले व्यक्तियों को देखकर हम जैसे कभी कभार वास्तविक मुद्दों पर ही आहत होने वालों को हीन भावना महसूस होती है कि हम इतने “ऑफेंडतुर” मतलब आहतातुर क्यों नहीं हैं। समाजवाद के पैरोकारों और अन्य बुद्धिजीविओ को इस पर विचार कर उन भौगोलिक , सामाजिक, भूगर्भीय कारणों का विश्लेषण कर उन कारणों का पता लगाना चाहिए, जिससे आखिर इस समाज में इतनी असमानता क्यों है। गरीबी-अमीरी के अलावा आहत होने की आवृति और प्रवृति मे अंतर भी सामाजिक समानता जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य में बाधक है।

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डिस्क्लेमर: यह एक हास्य-व्यंग्य लेख है और इसके सभी पात्र, घटनाएं अादि काल्पनिक हैं। कृपया इस खबर को सच समझकर व्यर्थ मे अपनी भावनाएं अाहत न करें। अाप भी तीखी मिर्ची ज्वाईन करके अपनी रचनाएं पोस्ट कर सकते हैं
sarcasticsharma
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पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी। वर्तमान में एक जर्मन एमएनसी में कार्यरत। समसामयिक विषयों पर व्यंग्य लेखन.

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