कुट रही है कूटनीति

हस्तिनापुर का एक अद्भुत युद्ध, जिसमे कुछ पता नहीं कौन किसकी तरफ है। इस कूटनीति को समझने की कोशिश में आप अपना सर कूट लेंगे!

हस्तिनापुर: दरबार सजा हुआ था…सभी लोग चिंतामग्न थे…छोटे मोटी चुनौतियां खत्म हो चुकी थी अब चुनौती बड़ी थी। विरोधी राजा बड़ा ही प्रतापी था, और उसके भय से राजा साहब को कुछ सूझ नहीं रहा था।

युद्ध के मैदान का एक विहंगम दृश्य, प्रधान ख़ुशी की मुद्रा में!
युद्ध के मैदान का एक विहंगम दृश्य, प्रधान ख़ुशी की मुद्रा में!

 

नई दिल्ली में ऐसा संग्राम पहले कभी नहीं हुआ था। सेनापति अपनी दाढ़ी खुजाते हुए बोले, “दोस्तों, आज का ये युद्ध हमारे आत्मसम्मान का युद्ध है। जो हमारे साथ पंजाब में हुआ उसके बदले का युद्ध है। सैन्य बल में हमारी दुर्बलता को देखते हुए हम अपने किसी सिपाही को आगे नहीं भेज सकते। लेकिन यदि कोई स्वेच्छा से अपना सर कटाने को तैयार हो जाए, तो हम उसे अवश्य भेज सकते हैं।”

बस अगले दिन से ही भर्तियों के लिए आवेदन आने शुरू हो गए। विभिन्न प्रकार के निपुड लोग आये, और वो लोग भी आये जो विरोधी सेना के खास सिपाही थे। वक़्त की खासियत है कि ये प्राथमिकताओं को बदल देता है…लोगों के आने से दिक्कत ये हुई कि मौजूदा प्रधान को बेदखल करके एक बाहरी को प्रधान घोषित कर दिया गया।

नए प्रधान को पुराने राजा के साथ काम करके उतना नाम नहीं मिला था, जितना मिलना चाहिए था। अच्छा काम करें और साला नाम भी न हो, ऐसा जीना भी क्या जीना है! अपनी मजबूत हैसियत के साथ अब नए प्रधान ने पहले अपने सेना पर ही अपनी शक्ति को आजमाना शुरू किया है। युद्ध के दिन से पहले उम्मीद है कि खुद की सेना आधी हो चुकी होगी। लेकिन क्या हुआ? प्रधान जी को प्रशासन का अनुभव जो है!

बिगुल बज रहा है मैदान सज रहा है :)

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डिस्क्लेमर: यह एक हास्य-व्यंग्य लेख है और इसके सभी पात्र, घटनाएं अादि काल्पनिक हैं। कृपया इस खबर को सच समझकर व्यर्थ मे अपनी भावनाएं अाहत न करें। अाप भी तीखी मिर्ची ज्वाईन करके अपनी रचनाएं पोस्ट कर सकते हैं
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About vinaychandrapandey 3 Articles
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