भैंस ने मोदीजी से की अपने ‘मन की बात’- लोग दूध का क़र्ज़ नहीं चुका पाते, आप चाय का क़र्ज़ कैसे चुकाओगे?

इंसानों द्वारा गायों को हद्द से ज़्यादा तवज्जो देने और भैंस को इग्नोर करने से फ्रस्टेट होकर एक बिचारि भैंस ने अपने 'मन की बात' इस खुले खत में रख दी। खत लिखा मोदीजी के नाम, जिसमें बाबा रामदेव को भी आड़े-हाथों लिया।

आजकल ‘गाय माता’ का ही जिक्र चल पड़ा है। मेरी ओर तो किसी का ध्यान ही नहीं! मैं भी दूध देती हूँ। लोगों को दूध-चाय-घी पिलाती हूँ। थोड़ा जिक्र और कद्र मेरी भी करवा दो।

ये मनुष्य भी अजीब प्राणी है। नमक हरामी तो इसके खून में ही व्याप्त है। गाय को तो ‘गाय माता’ मान लिया, कोई ऐतराज़ नहीं। मैं भी तो दूध देती हूँ। माता का रंग काला नहीं हो सकता? मेरा दूध पीते बच्चों की मैं कुछ नहीं? मौसी-बुआ-चाची ही मान लो। मनुष्य जन्म लेते ही माँ का दूध पीता है। माँ को दूध आना बंद होते ही गाय के दूध पर आ जाता है। महंगाई को ध्यान में रख फिर बड़ा होकर अपनी औकात पर आ जाता है, और मेरे दूध पर ही फूलता-फलता है। फिर भी साला प्रचार यही करता है कि- ‘अमूल दूध पीता है इंडिया’।

Baba Ramdev and Buffelo
फोटो: भैंसें और उनकी अजीबोग़रीब फैंटेसियाँ!

आयुर्वेद वाले गाय का दूध और घी का सेवन करने की सलाह देते हैं, कहते है हल्का और गुणकारी होता है। आजकल तो टेलीविज़न पर भी रामदेवजी गाय के घी को अपनी ‘एक नज़र’ से फायदेमंद दिखाता रहता है। क्या हमारा घी घी नहीं होता? कभी-कभी तो इस खुल्लम खुल्ला पक्षपात से मेरे तो जी में आता है कि मौका देखकर उनके पिछवाड़े में सिंग घुसेड़ दूँ। पर डरती हूँ, फिर मेरी ‘सुरक्षा’ कौन करेगा? मैं गाय थोड़े ना हूँ! जब कि सच्चाई यह है कि सरकारी दफ्तरों में मेरे ही दूध की चाय पी-पी कर इतने मोटे तगड़े बन पाए हैं बाबू लोग। वर्ना ढेर सारी फाइलों के बोझ तले ही दबकर रह जाते।

वैसे तो आदि काल से ही मेरे साथ अन्याय और पक्षपात होता रहा है। बाल गोपाल श्री कृष्ण भी गायों के साथ ही घूमे, गायों को ही चराने ले जाते थे, गाय का ही मक्खन मटकी भर-भर के उड़ाया। गायों के साथ ही फोटो भी खिंचवाई। एकाद ‘सेल्फी’ मेरे साथ भी ले लेते तो क्या बिगड़ जाता नटखट का!

कहावतों में तो बेशर्म होकर मेरा नाम लिया जाता है, यह अन्याय है। जैसे —

१. “गयी भैंस पानी में” – क्यों भाई ? हाथी – मगर मच्छ – हिप्पो इत्यादि पानी में नहीं जाते क्या ? अकेली मैं ही जाती हूँ पानी में ? लोग भी स्विमिंग पूल में नहीं घुस जाते क्या ? इन सबका भी नाम लिया करो कभीकभी !

मेरी मानो, तो इसके बदले में एक नयी कहावत का सुझाव देती हूँ – ‘गए मोदी विदेशयात्रा पे’!

२. “काला अक्षर भैंस बराबर” – तो क्या दुसरे प्राणी पोस्ट ग्रेजूएट है क्या ? सफ़ेद अक्षर गधे के बराबर- हरा अक्षर तोते के बराबर – केसरी अक्षर कुत्ते के बराबर .. क्यों नहीं बोलते ?

३. “भैंस के आगे बीन बजाना” – तो क्या बाकी के प्राणी के आगे गिटार- सितार – वायलिन बजाते हो क्या ?

बस ! ये तो यूँ ही मन की व्यथा थी, तो मैं भी ‘मन की बात’ सुनाने आ गयी।

मोदीजी, मुझे आपसे बहुत उम्मीद है। पिछले 60 साल से मैं भी राखीजी की तरह अन्याय सहती रही हूँ। आप और अमितजी मेरे ‘करण-अर्जुन’ हो। दो साल से बोलते रहते हो- ‘सब का साथ सबका विकास’। मैंने आपको चाय बेचने में मेरा भरपूर दूध देकर साथ दिया, अब आप मेरा भी थोड़ा विकास करवा दो। #SelfieWithDaughter के नाम पर मेरे साथ एक सेल्फ़ी खिंचवा कर ट्वीटर पर डाल दो। रामदेव भले ही गाय दीदी का दूध-घी-मूत्र कुछ अमीर लोगों को बेचता फिरे, आप अपने मंत्रीमंडल और सरकारी दफ्तरों में मेरे ही दूध-चाय-मूत्र के कम्पलसेरी इस्तेमाल का आदेश करवादो।

राजनीती में टिके रहने के लिए “मोटी अक्ल” और “मोटी चमड़ी” बनाने के लिए मेरा दूध सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा विज्ञापन चलवा दो बस !

मोदीजी, बस अब मेरे दूध की चाय का क़र्ज़ चुका दो।
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PS: वैसे आजकल एक गाना सुनकर मैं भी झूम उठती हूँ – ‘बेबी को भेस पसंद है- बेबी को भेस पसंद है!’

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डिस्क्लेमर: यह एक हास्य-व्यंग्य लेख है और इसके सभी पात्र, घटनाएं अादि काल्पनिक हैं। कृपया इस खबर को सच समझकर व्यर्थ मे अपनी भावनाएं अाहत न करें। अाप भी तीखी मिर्ची ज्वाईन करके अपनी रचनाएं पोस्ट कर सकते हैं
Vishnu Tibdewala
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हास्य हेतु व्यंग्य। कटाक्ष ना समझे। कटाक्ष को व्यंग्य ना समझे।

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