बाबा रामदेव के नाम खुला ख़त

पेश है Baba Ramdev के नाम तीखी मिर्ची का खुला ख़त, जिसमे हम उनसे पूछ रहे हैं वो सवाल जो हमेशा से आम जनता के जेहन में थे।

बिज़नस वाले बाबा मुझे नूडल खिला दो! (फ़ोटो साभार: द हिन्दू) Baba Ramdev launches Patanjali noodles
बिज़नस वाले बाबा मुझे नूडल खिला दो! (फ़ोटो साभार: द हिन्दू)

आजकल खुला ख़त लिखने का फैशन चला हुआ है, तो मैंने भी सोचा क्यों ना मैं भी आपके नाम एक खुला ख़त लिख ही डालूँ। खुला ख़त जिसको लिखा गया है, वो पढ़े या ना पढ़े, लेकिन पूरी दुनिया जरूर पढ़ लेती है।

तो मुद्दे की बात पर आते हैं, मुझे आपसे कोई दिक्कत नहीं है, ना ही हमारी कोई निजी दुश्मनी है। लेकिन जब आप लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने लगते हैं, तब मुझे बहुत ख़राब लगता है।

सबसे पहले तो आप अपने नाम के आगे से बाबा शब्द हटा दो। क्योंकि सारा झमेला यही से शुरू होता हैं।

बाबा उसको बोला जाता है, जिसे किसी भी बात का लोभ ना हो। खास कर के तीन चीज़ों का तो बिलकुल भी लोभ नहीं होना चाहिए:

i.) पुत्र-परिवार लोभ

ii.) पैसों का लोभ

iii.) मान-सम्मान का लोभ

आप में तो ये कुट- कुट के भरी हुयी है। इसलिए कृपया अपने नाम के आगे से बाबा शब्द हटा लीजिये।

आपने जिससे योग की शिक्षा-दीक्षा ली, उसने तो आप से कोई धन नहीं माँगा होगा, तो फिर आप क्यों लोगों से पैसे बटोर कर टापू खरीदने में लगा रहे हैं?

जहाँ तक मेरी जानकारी है, पतंजलि ऋषि ने भी किसी भी चीज़ की कामना नहीं की, और आप तो उनके नाम का दुरुपयोग कर के नमक से लेकर घी तक बेच रहे हो।

आपने जो शुद्धता का दावा किया, वो भी कई जगह गलत पाया गया।

जहाँ तक स्वदेशी की बात है, तो उसके लिए भी बहुत सारी स्वदेशी कंपनियाँ हैं, इसलिए स्वदेशी का ढिंढोरा पीटने की कोई जरुरत नहीं हैं।

मुझे कोई आपत्ति नहीं हैं अगर आप भी अपने आप को बाबा कहलाना छोड़, अम्बानी बिरला की तरह कारोबार करें।

आपका,
बाबा बांकेलाल।

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डिस्क्लेमर: यह एक हास्य-व्यंग्य लेख है और इसके सभी पात्र, घटनाएं अादि काल्पनिक हैं। कृपया इस खबर को सच समझकर व्यर्थ मे अपनी भावनाएं अाहत न करें। अाप भी तीखी मिर्ची ज्वाईन करके अपनी रचनाएं पोस्ट कर सकते हैं
Shubham
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कुछ नहीं से कुछ भी बनाने की कला।

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