दिल्ली इलेक्शन के बाद की गपशप

दिल्ली इलेक्शन के ठीक बाद हमारे पत्रकार ने अपने जिगरी मित्र 'भीड़ू' से 'चाय पे चर्चा' की। पढ़िए उनकी बातचीत के मुख्य अंश।

मैं: यार भिडू, दिल्ली में तो AAP ने कमाल कर दिया! क्या थप्पड़ मारा है दिल्ली की जनता ने BJP को दिल्ली इलेक्शन में।

भिडू : यह तो होना ही था। थप्पडों के भूत बातोंसे नहीं मानते। देश किसी की जागीर नहीं है, ऐसा कांग्रेस को समजाने वाले खुद ही देश को अपनी जागीर समझने लगे थे। दिल्लीवालों ने अब सही मायने में सबको समझा दिया कि वास्तव में देश किसीके भी बाप की जागीर नहीं है। अरे भाई, देश की जनता ने बहुत कुछ झोली में डाल दिया है, उसको तो पहले संभाल? थोड़ा मन में संतोष रखो, थोड़ा ठण्ड रखो। ये भी लेलूं वो भी लेलूं!! क्या है इतना लेलूं लेलूं! फ़ट जाएगी झोली। बच्चे जैसा नहीं करनेका, पूरी खिलौनोंकी दुकान के लिए जिद्द पर अड़ जाते है। 

मैं: हां यार। क्या क्या नहीं बोला गया केजरीवाल को? बच्चोंकी झूठी कसम खाने वाला, सत्ता के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाने वाला, मकान लेने वाला, सिक्योरिटी लेनेवाला, जिम्मेदारी से भागनेवाला, U टर्न वाला, U टर्न वाला, वगेरह… वगेरह…। अरे भाई, खुद को तो देखो, U टर्न मारते मारते गोल गोल Circle में घूमते दिखाई पड़ रहे हो।  

भिडू: बीजेपी – कांग्रेस का तो ठीक, देश समझ ही नहीं पाया केजरीवाल को सिवाय दिल्ली की जनता के। CM की कुर्सी मिलने के बाद, कोई एक माइ का लाल हो तो बता, जो एकपल में अपनी इच्छा से खुर्शी त्याग दे। बिहार का देख रहा है ना? कैसे कुर्शी से फेविकोल लगा के चिपक गया है? भई, बहुमत नहीं मिला तो किसी का साथ लेना भी पड़ता है। कम सीट वालो का साथ लेनेसे उसको भी तो सुधरने का मौका मिलता है। आखिर वो भी तो जनता की सेवा करने हेतु ही तो चुनाव में कूदता है। खुद BJP ने ही महाराष्ट्र में क्या क्या ड्रामा करके फडणवीस को बैठाया है, मतलब तो अपना CM बनाने का ही था ना? दिल्ली में बेदी को अन्य पक्ष से उठाकर बीजेपी का CM उम्मीदवार घोषित करना, वो कौनसी साफसुथरी राजनीती की मिशाल है? CM बनने के बाद कामकाज करने के लिए थोड़ा व्यवस्थित मकान होना चाहिए कि नहीं? CM बनने के बाद जिसे जनता से कोई डर नहीं लेकिन विरोधी पक्षों से अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए सिक्योरिटी लेनी पड़ेगी या नहीं?  देश की जनता से डर नहीं लगता बाबू, विरोधी दलोंसे डर लगता है। देश की जनता से यदि किसीको डर लगता तो आज देश की सूरत कुछ और ही होती। और सुन, कसम खाई तो अपने बच्चो की खाई, पडोसी के बच्चो की तो नहीं खाई? चुनावी प्रचार में किये वादोंको  “राजनितिक जुमला ” बताकर जनता को सिर्फ उल्लू बनाने से तो बेहतर ही है।  बात करते है …………

भिडू लम्बी सांस लेकर फिर बोला: मोदी ने अपने सपथग्रहण समारोह में देश के दुश्मन को न्योता दिया, गले लगाने की हास्यस्पद कोशिश की। मिला क्या? बाबाजी का ठुल्लु? केजरीवाल को भी बुला सकता था, जानी दुश्मन थोड़े ही है। 26 जनवरी को भी याद नहीं किया ? गन्दी बात। गन्दी गन्दी गन्दी गन्दी बात।

मैं:यार भिडू , तू सीरियस बहुत हो जाता है। थोड़ी हलकी फुलकी बाते भी किया कर। सेहत के लिए अच्छा है। यह बता, किरण बेदी का क्या होगा?

भिडू (मार्मिक हास्य चेहरे पर लेकर ): होगा क्या? वो ही होगा जो मंजूर-ए-मोदीशाह होगा!

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डिस्क्लेमर: यह एक हास्य-व्यंग्य लेख है और इसके सभी पात्र, घटनाएं अादि काल्पनिक हैं। कृपया इस खबर को सच समझकर व्यर्थ मे अपनी भावनाएं अाहत न करें। अाप भी तीखी मिर्ची ज्वाईन करके अपनी रचनाएं पोस्ट कर सकते हैं
Vishnu Tibdewala
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हास्य हेतु व्यंग्य। कटाक्ष ना समझे। कटाक्ष को व्यंग्य ना समझे।

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