पल्टूओं की बातें, जो एक कौवे ने सुन ली

किरण, शाज़िया, बिन्नी वगैरह बगीचे में बैठे थे। दिल्ली के चुनाव के बारे मे गहरी चर्चा कर रहे थे, हमारे पत्रकार ने कौवे का रूप धरकर चुपके से इनकी बातें सुन ली, और रिकॉर्ड करके हमारे नॉएडा स्टूडियो भेज दिया। पढ़िए उनकी बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट-

यहीं हैं वो तीखी मिर्ची के पत्रकार जिन्होंने कौव्वे का रूप धरा
यहीं हैं वो तीखी मिर्ची के पत्रकार जिन्होंने कौव्वे का रूप धरा

तीखी मिर्ची के पत्रकार कौवे का रूप धरे पार्क में बैठे थे, जहाँ किरण, शाज़िया और बिन्नी जमा थे। थोड़ी देर सभी ऐसे मौन बैठे रहे, जैसे किसी ने ‘काले धन’ के बारे में पूछ लिया हो। आखिरकार किरण दीदी ने शुरुआत की:

किरण: इसको नेतागीरी करनी आती ही नहीं। CM बनने का मौका मुश्किल से मिला था। हम भी सब कहीं ना कहीं लाइफ में सेट हो जाते। थोड़ी बहुत देश की सेवा भी कर लेते। लेकिन साला लोकपाल की जिद्द में सब गुड-गोबर हो गया! अन्ना भाऊ को भी किनारे करके हम आगे निकल आये।

शाज़िया: सच है दीदी, मेरे दिल में भी कुछ-कुछ तो होता ही है। पता नहीं क्या है!

किरण: अब यह ‘मोदी का शाह’ बड़ा उस्ताद है। राजनीति तो लगता है, उसकी माँ ने जन्मघूंटी में पिलाई है। लगता है अपना पत्ता हमेंशा के लिए कट जायेगा। हमने जो जीवन में कुछ कर गुजरने की ठानी है, साली दिल की दिल में ही दब के रह जाएगी क्या? पुलिस की नौकरी में इतना मज़ा नहीं आया :(

बिन्नी (झुंझलाहट में): पार्टी में मेरी तो साली कोई इज़्ज़त ही नहीं है। क्या-क्या सोचा था? मिला क्या? बाबाजी का ठुल्लु?

(सब एक साथ): क्यों ना BJP में ही घुसा जाय!

साजिया: लेकिन केजरीवाल को कैसे बताएँगे?

किरण: केजरीवाल ने रिजाइन करने से पहले किसी को बताया था क्या? फिर??

…to be continued.

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डिस्क्लेमर: यह एक हास्य-व्यंग्य लेख है और इसके सभी पात्र, घटनाएं अादि काल्पनिक हैं। कृपया इस खबर को सच समझकर व्यर्थ मे अपनी भावनाएं अाहत न करें। अाप भी तीखी मिर्ची ज्वाईन करके अपनी रचनाएं पोस्ट कर सकते हैं
Vishnu Tibdewala
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हास्य हेतु व्यंग्य। कटाक्ष ना समझे। कटाक्ष को व्यंग्य ना समझे।

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