वाचाल बेशर्मा जी की समाजसेवा

हमारे पड़ोस के बड़बोले, वाचाल बेशर्मा जी को ट्यूशन के बाद अब समाजसेवा करने सूझी, पढ़िए कैसा रहा उनका ये सफर...

आज आपको वाचाल बेशर्मा जी का एक और किस्सा सुनाता हूँ| हुआ यूं, कि एक बार वाचाल जी को समाजसेवा करने की मन में आई, अब समाजसेवा तो करनी थी, मगर उसके लिए पैसा कहाँ से आये? क्यूंकि बचपन से चाय बेच कर उन्होंने इतना पैसा तो जमा नहीं किया था कि किसी गरीब की मदद कर सकें, तो उन्होंने ये बात फैलानी शुरू कर दी कि सब लोग मुझे कुछ पैसा दान दे तो मैं सभी गरीबों की मदद करूँगा। उनके लिए घर बनाऊंगा, उन्हें रोज़गार दिलाऊंगा, और भी कई वादे कर डाले|

दम्भानी भाई के हेलीकाप्टर में उड़ते बेशर्मा जी
दम्भानी भाई के हेलीकाप्टर में उड़ते बेशर्मा जी

इस बात को अधिक से अधिक लोगों तक पंहुचाने के लिए वाचाल जी अपने खास दोस्त श्री दम्भानी भाई का प्राइवेट हेलीकाप्टर लेकर भी जगह जगह घूमते रहे, और अपनी बचपन की गरीबी के किस्से सुनाते रहे, ताकि लोगों को ये यकीन हो जाये कि वाकई में यही वो इंसान है जो गरीबों का दर्द समझ सकता है। लोग उनको इतना गौर से सुनते कि रोज के उनके नए कुर्ते को देखना ही भूल जाते, ना कोई ये सोचता कि दम्भानी भाई जो खुद गरीबों के “मसीहा” हैं ये गरीबी दूर क्यूँ नहीं कर देते| लोग पैसे दे-दे कर गरीबी पर इनके विचार सुनने आते|

खैर, आखिर वाचाल जी की मेहनत रंग लाई और लोगों ने इन पर विश्वास कर के ये तय कर लिया कि अब से अपनी बचत का एक हिस्सा वाचाल जी को जरूर देंगे, ताकि वो गरीबी दूर कर सकें। मगर लोग क्या देखते हैं कि जब से वाचाल जी को उन्होंने धन दिया तब से वाचाल जी पड़ोसी गाँव में ही जाकर बस गए हैं। आस पास के जितने गाँव है, सब घूम लिए और वहां जाकर पैसे लुटा रहे हैं, और खुश हो रहे हैं ठीक वैसे ही जैसे एक पजामे वाला गरीब निक्कर वाले गरीब को देख कर खुद को अमीर महसूस करता है।  बीच-बीच में कभी जब लगता है कि कोई और उनका हक़ ना मार ले तो कुछ दिन के लिए लौट आते हैं। लोगों को खुद एक दूसरे की मदद करने का कहने लगे हैं। और तो और जो पैसा इकठ्ठा हुआ था, उससे उन्होंने अपनी बहुत बड़ी मूर्ती का निर्माण शुरू कर दिया|

किसी ने पूछा कि वाचाल जी आप जिस पैसे से गरीबों की मदद करने वाले थे उससे ये मूर्ति क्यूँ बनवा रहे हो? तो कहने लगे कि तुम तो निपट मूर्ख हो यार, तुम केवल अभी का सोचते हो। मैं आज से 10 साल बाद की सोच रहा हूँ। देखो अभी जो पैसा है वो तो इस मूर्ति में लग जायेगा, पर उसके बाद आस पड़ोस के गाँवों से लोग इस मूर्ति को देखने आयेंगे तो तुम लोग यहाँ अपना ठेला लगा सकते हो, यहाँ चाय बेच सकते हो, और कमाई कर के खुद अपनी गरीबी दूर कर सकते हो। और रही बात पड़ोस के गाँव में पैसे लुटाने की, तो तुम लोग सोचो कि जब ये बात बड़े-बड़े शहरों तक फैलेगी कि हम इतना धन लुटा रहे हैं तो उन्हें लगेगा कि हम अमीर हो गए तो वो खुद चल कर हमारे यहाँ अपना सामान बेचने आयेंगे। तब तुम लोग उनके लिए ठहरने के लिए धर्मशाला बनवा देना, उन्हें घुमाने के लिए टैक्सी चला लेना, कर्मठ बनोगे तभी तो गरीबी दूर होगी। अब आया समझ कि मेरा दिमाग कितना तेज़ चलता है?

बेचारे गाँव वाले क्या करते? जितने समय के लिए उन्हें चुना था, उतने वक्त तो झेलना ही था, तो मन मसोस कर रह गए। मगर जाते-जाते इतना जरूर कह गए कि जब सब हमें ही करना था तो हमने आपको चुना ही क्यूँ?

पढ़िए पार्ट-1: वाचाल बेशर्मा जी की ट्यूशन क्लास 

डिस्क्लेमर:- इस कहानी के सभी पात्र वास्तविक हैं जिनका सभी जिन्दा व मुर्ख बने लोगों से सीधा सम्बन्ध है| यदि किसी व्यक्ति को इसमें समानता नहीं मिलती है तो इसे मात्र उसका दुर्योग कहा जायेगा|

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डिस्क्लेमर: यह एक हास्य-व्यंग्य लेख है और इसके सभी पात्र, घटनाएं अादि काल्पनिक हैं। कृपया इस खबर को सच समझकर व्यर्थ मे अपनी भावनाएं अाहत न करें। अाप भी तीखी मिर्ची ज्वाईन करके अपनी रचनाएं पोस्ट कर सकते हैं
Vikas Purohit
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A writer and a poet.

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