“सेल”

एक छोटी सी स्टोरी...

साड़ियां
“सेल की साड़ियां”

वो बड़े गर्व से अपनी कक्षा के सभी साथियों को बता रहा था कि उसकी मम्मी ने सारे पुराने कपडे निकाल लिए हैं, और अब इस रविवार वो मम्मी के साथ उनको गरीबों में बांटने जाएगा।

वो रोज़ अपने कार्यक्रम की प्रगति बताता कि कैसे मम्मी ने सारी जगह भी पता कर ली है जहाँ गरीब मिलेंगे, और कितने कपडे इस बार ले जाने हैं, कितने अगली बार। वो उन सब बातों को इतने विस्तार से बताता जैसे उसकी मम्मी दुनिया में सबसे अच्छी हो, साथ ही ये भी कहता कि साथ में कैमरा भी लेकर जायेगा, ताकि उनके साथ अपना फोटो निकाल सके।

सभी साथी मंत्रमुग्ध होकर इस तरह से सुनते जैसे मन ही मन कह रहे हों कि काश हमारी मम्मी भी ऐसी होती जो गरीबों की मदद करती।

सोमवार को जब वो स्कूल आया तब उसका चेहरा कुछ उतरा हुआ लग रहा था। दोस्तों ने पूछा तो उसने यही कहा कि बहुत अच्छा रहा, कैमरा ले जाना भूल गए इसलिए फोटो नहीं ला पाया। बस में घर आते वक्त वो यही सोच रहा था कि, काश पड़ोस कि आंटी ने मम्मी को पुराने कपड़ो के बदले नई साड़ियाँ मिलने वाली “सेल” के बारे में ना बताया होता तो आज दोस्तों के सामने उसे मम्मी की “इमेज” बचाने के लिए झूठ ना बोलना पड़ता।

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डिस्क्लेमर: यह एक हास्य-व्यंग्य लेख है और इसके सभी पात्र, घटनाएं अादि काल्पनिक हैं। कृपया इस खबर को सच समझकर व्यर्थ मे अपनी भावनाएं अाहत न करें। अाप भी तीखी मिर्ची ज्वाईन करके अपनी रचनाएं पोस्ट कर सकते हैं
Vikas Purohit
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A writer and a poet.

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